मिथिला राज्य के औचित्य के विभिन्न पहलुओं पर हुआ कारगर विमर्श !

मिथिला राज्य के औचित्य के विभिन्न पहलुओं पर हुआ कारगर विमर्श  आलेखों के पुस्तककार का किया गया विमोचन  मिथिला के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक,...

मिथिला राज्य के औचित्य के विभिन्न पहलुओं पर हुआ कारगर विमर्श 


आलेखों के पुस्तककार का किया गया विमोचन 


मिथिला के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, साहित्यिक और भाषा के क्षेत्र में समग्र विकास के लिए पृथक मिथिला राज्य का गठन निहायत जरूरी है। क्योंकि सांस्कृतिक संपन्नता के लिए दुनिया भर में विख्यात मिथिला आज सरकारी अपेक्षाओं के कारण लगातार आर्थिक पिछड़ेपन का शिकार होने को मजबूर हो रहा है। उक्त बातें एमएलएसएम कालेज के पूर्व प्रधानाचार्य डा विद्यानाथ झा ने सोमवार को विद्यापति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित 'मिथिला राज्यक औचित्य' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में अपना विचार रखते हुए कही। उन्होंने कहा कि सरकारी उदासीनता का नतीजा है कि जिस मिथिला क्षेत्र के गांव-गांव में कभी शिक्षा का केंद्र हुआ करता था, आज वहां के छात्र पलायन को मजबूर हो रहे हैं।


बतौर मुख्य अतिथि ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के डीन सह राजनीति विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो जितेन्द्र नारायण ने कहा कि मिथिला सूखा और बाढ़ कि कोढ का निरंतर शिकार होता आ रहा है और इसके आस पास आंसू पोछने वाला कोई नहीं है। जहां एक और खेती चौपट हो गई है, वहीं मिथिला के मजदूर पलायन करने को विवश हो रहे हैं। रोजगार के अभाव का दंश झेलने के लिए भी यह क्षेत्र कम मजबूर नहीं हो रहा। चीनी मिल, पेपर मिल, जूट मिल आदि यहां कबार का ढेर मात्र बने हुए हैं। मिथिला की प्रतिभा रोटी के लिए विभिन्न प्रदेशों में मजदूरी करने को विवश है। इन सभी समस्याओं के निदान के लिए पृथक मिथिला राज्य के गठन की मांग क्षेत्र के समग्र विकास के लिए यथोचित है। 

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए यूएसए के कौन्सिलेट शरद कुमार झा ने कहा कि मैथिली भाषा-साहित्य का विकास संरक्षण के अभाव में प्रभावित हो रहा है। ऐसा लगता है कि मैथिली के प्रति सरकारी स्तर पर जैसे षड्यंत्र चल रहा है। संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित बिहार की एकमात्र भाषा मैथिली को राज-काज की भाषा बनाये जाने में कोताही बरता जाना निन्दनीय है। भाषा के आधार पृथक मिथिला राज्य का गठन होने से निदान संभव है।

संगोष्ठी के संयोजक मणिकांत झा के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने किया। कार्यक्रम के दौरान संगोष्ठी में भाग लेने वाले प्रतिभागियों ने अपने आलेख पढ़े और मिथिला राज्य के औचित्य के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों के आलेखों के पुस्तकाकार स्वरूप का सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों ने मिलकर विमोचन किया। वरिष्ठ कवि डाॅ जयप्रकाश चौधरी जनक ने पृथक मिथिला राज्य के गठन के लिए हाल के दिनों में हुए आंदोलनों को सुखद बताया। डा ओमप्रकाश ने कहा कि आजादी के 75 वर्षों में मिथिला में बेरोजगारी और पलायन में बेहताशा वृद्धि हुई है। सभी चीनी व जूट मिल सहित उद्योग- धंधे बंद हो गए हैं। इसलिए मिथिला के सर्वांगीण विकास के लिए अलग मिथिला राज्य का गठन जरूरी है। क्योंकि मिथिला की प्रगति सरकारी उपेक्षा के कारण दिशाहीन हो गयी है। प्रो अयोध्यानाथ झा ने कहा कि 2021 के रिपोर्ट में भी बिहार गरीबी में देश भर में अव्वल है। ऊपर से मगही शासन की कुदृष्टि से मिथिला निरंतर दरिद्रता की ओर बढ रहा है। जब तक हम पूर्ण रूप से संगठित नहीं होंगे हमें मिथिला राज्य नहीं मिलेगा। यह किसी एक व्यक्ति या संस्था की मांग नहीं है। यह संपूर्ण मिथिला वासियों की बहुत पुरानी मांग है जिसके लिए हम लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं।

 अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ पत्रकार विष्णु कुमार झा ने कहा कि मिथिला क्षेत्र लगातार बिहार से अलग होने की बात कर रहा है। क्योंकि मैथिलों के लिए बिहारी शब्द मिथिला के नैतिक पहचान ,नैतिक मूल्य, सभ्यता-संस्कृति, भाषा एवं विकास में बाधक जान पड़ता है और उन्हें लगता है कि इस कारण बिहार में मैथिलों की पहचान लुप्त होती जा रही है। वहीं विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव डॉ बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने मिथिला राज्य के औचित्य पर आधारित आलेखों के पुस्तकाकार संकलन को उपयोगी बताया।

गंधर्व कुमार झा की वेद ध्वनि से शुरू हुई संगोष्ठी में डा सुषमा झा ने स्वागत गीत एवं जानकी ठाकुर ने गोसाउनि गीत प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों में डॉ सत्येंद्र कुमार झा, डॉ रमेश झा, नीलम झा, हीरेंद्र कुमार झा, शंभू नाथ मिश्र आसी, आभा झा, स्वर्णिम किरण झा, मोहन मुरारी, अखिलेश कुमार झा, प्रवीण कुमार झा, अमित मिश्र, साहेब कुमार ठाकुर, हीरा कुमार झा, रामचंद्र राय आदि ने आलेख प्रस्तुत कर अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम में डाॅ गणेश कांत झा, प्रो चन्द्र शेखर झा बूढाभाई, नीतीश सौरभ, संतोष कुमार झा, दुर्गा नन्द झा, नवल किशोर झा, आशीष चौधरी, पुरुषोत्तम वत्स आदि की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। सभी प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति उपहार प्रदान करने के साथ ही पाग, चादर एवं कलम भेंट कर सम्मानित किया गया।

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